//hindi

कब बनी जगह?

भारत में समकालीन वास्तुकला पर एक प्रदर्शनी
अभीक्षक व कल्पनाकार: रुपाली गुप्ते और प्रसाद शेट्टी

 

समकालीन जगह-सम्बन्धी रियाज़ों और प्रथाओं का एक बड़ा हिस्सा तीन व्यापक अनिवार्यताओं के आसपास संरचित हो रहा है। पहली, कम्प्यूटेशन और गणितीय तर्क; दूसरी, पर्यावरण-सम्बन्धी और सांस्कृतिक संवेदनशीलता; और तीसरी, शहर और जन-साधारण पर चिंतन। कई मायनों में, ये तीनों अनिवार्यताएँ जयपुर के संस्थापक, सवाई जयसिंह, और जवाहर कला केंद्र के आर्किटेक्ट, चार्ल्स कोरिआ, की लगन में भी महत्वपूर्ण थीं। दोनों में ब्रह्मांड के रहस्यमय गणित के प्रति रुझान था, पर्यावरण और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के अनुसार इमारतों की निरंतर पुनर्खोज करने की बेचैनी थी, और एक आदर्श, न्यायसंगत, और सतत-परवाह शहर बनाने का जुनून था। इस प्रदर्शनी में जयसिंह की दर्शन-दृष्टि, कोरिआ के दृष्टिकोण, और समकालीन जगह बनाने के तरीक़े और मामलात एक साथ लाने की वैचारिक महत्वाकांक्षा है। इस संवाद को ये तीन ठोस उकसाव चिन्हित कर सकते हैं:

ब्रह्मांड का गणित — क्या होता है जब गणितीय तर्क को आकार और जगह को (पुनर) निर्मित करने के लिए गतिमान किया जाए? क्या इस तरह झलक मिल पाएगी ब्रह्मांड के तर्क की?

जीवन और जीने का नियमबद्ध क्रमीकरण — निर्मित आकार और भू-दृष्य के नियमबद्ध क्रमीकरण की तहक़ीक़ात की जाए और उनका पुनः रूपांतरण किया जाए, तो जीवन के कौन से नए रूप उत्पादित होते हैं?

सामूहिकता के रूप — सामूहिकता की अंदरूनी विविधता को ले कर चलने का सामर्थ्य रखता हो, मुमकिन है क्या ऐसा शहरी रूप? जीवन के अन्वेषण के लिए समर्थकारी संरचना और नए तर्क क्या हों?

 

‘कब बनी जगह?’ न्यौता है आर्किटेक्टों और आर्टिस्टों को, कि वे इन सवालों पर अपनी सोच रखें। यहाँ “जगह” के पैमाना विविधता लिए है, और उसका वास्ता ब्रह्मांड से लेकर सामाजिक स्थान से लेकर परिदृश्य से लेकर सूक्ष्म वातावरणों से है। कैसे समझें जगह को? क्या लगता है जगह बनने में? वो कौन सी नई दिशाएं हों जिनमें जगह के सोच और अभ्यास गतिवान हो सकें? यह प्रदर्शनी जगह बनाने के तरीकों को एकत्र करती है — जगह पर बनते दावों को लामबंद कर, अफ़साने रच कर, हदों और दायरों को छेड़-धकेल कर, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) के संदर्भों का विचार कर, और उन रिवाज़ी तरीकों को जाँच-परख कर जिनसे अब तक निर्माण होता आया है। अपने उकसावों से एक आवेशपूर्ण परिदृश्य बनाते हुए ये प्रदर्शनी जवाहर कला केंद्र को जगह बनाने के तरीकों को टटोलती प्रयोगशाला के रूप में देखती है।

 

***

अभीक्षक टोली: अनुज डागा (सहायक क्युरेशन), मिलिंद महाले (प्रॉडक्ट डिज़ाइन), दिप्ती भाईन्दरकर (इंतिज़ाम), श्वेता सारदा (अनुवाद), ध्रुव चव्हाण और कौशल वडके (वास्तुकला सहायता)

सहभागी: अबिन डिजाइन स्टूडियो, ऐनाग्राम आर्किटेक्ट्स, ऐंटहिल डिजाइन, अनुज डागा, आर्किटेक्चर ब्रियो, आयोजन स्कूल ऑफ़ आर्किटेक्चर, भगवती प्रसाद, ध्रुव जानी, द्रोणाह, जीजी स्कारिया, सर जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर एंड मुस्तानसिर दलवी, मेड इन मुंबई, एम प्रवात, मनसिनि , मार्क प्राइम, मिलिंद महाले, मैथ्यू-एंड-घोष, महाराजा सवाई मान सिंह (द्वितीय) संग्रहालय, पारुल गुप्ता, मैसर्स प्रभाकर भागवत, प्रसाद खानोलकर, रणधीर सिंह, रक़्स मीडिया कलेक्टिव, समीप पाडोरा + एसोसिएट्स, समीर राउत, समिरा राठौड डिजाइन अटेलियर, सेहर शाह, तेजा गावंकर, बसराइड डिजाइन स्टूडियो, द अर्बन प्रोजेक्ट, विकास दिलवारी , विशाल के दार।

आयोजना: पूजा सूद, महानिदेशक, जेकेके

 

Advertisements